यह उपनिषद शब्द ब्रह्म की व्याख्या करता है. ॐकार शब्द ब्रह्म है. इसके अंतर्गत संसार की उत्पत्ति, विस्तार और लय और अनिर्वचनीय स्थिति अर्थात जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता, समायी है. वह भूत, वर्तमान और भविष्य है, समय से परे भी वही है.
ॐ अक्षर ब्रह्म हैजगत है प्राकट्यभूत भवि भव ॐकार हैकाल परे भी सोहि.जो कुछ है वह ब्रह्म हैनहिं परे पर ब्रह्मचरण चार पर ब्रह्म केजान विलक्षण ब्रह्म.चार पाद – जाग्रत, स्वप्नवत, सुसुप्त और अनिर्वचनीय जिसे आत्मा कहा है.ब्रह्म जागृति जगत हैजो विस्तृत ब्रह्माण्डलोक सात हैं सप्त अंगमुख उन्नीस हैं जानपाद प्रथम वैश्वानर जिसकाभोगे जग दिव रात्रि.स्वप्न भांति सम व्याप्त जगज्ञान ब्रह्म पर ब्रह्मसात अंग उन्नीस मुखतैजस दूसर पाद.विशेष – सात अंग सात लोक हैं. मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा, सहत्रधार चक्र. उन्नीस मुख पांच कर्मेन्द्रियाँ,पांच ज्ञानेन्द्रियाँ.पांच प्राण- प्राण, अपान, समान,’व्यान, उदान तथा मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार.नहीं कामना सुप्त मेंनहीं स्वप्न नहिं दृश्यसुप्त सम है ज्ञान घनमुख चैतन्य परब्रह्मआनन्द भोग का भोक्तातीसर पाद पर ब्रह्म.यह सर्वेश्वर सर्वज्ञ हैअन्तर्यामी जानसकल कारण जगत कासभी भूत का यही निधान.प्रज्ञा अंतर की नहींनहीं बाह्य का प्रज्ञभीतर बाहर प्रज्ञ नाना प्रज्ञाघन जाननहीं प्रज्ञ अप्रज्ञ नहिंनहीं दृष्ट अव्यवहार्यनहीं ग्राह्य नहिं लक्षणानहीं चिन्त्य उपदेशजिसका सार है आत्माजो प्रपंच विहीनशान्त शिवम अद्वितीय जोब्रह्म का चौथा पाद.वह आत्मा ॐकारमयअधिमात्रा से युक्तअ ऊ म तीन पाद हैंमात्रा जान तू पाद.अकार व्याप्त सर्वत्र हैआदि जाग्रत जानवेश्वानर यह पाद हैजान प्राप्त सब काम.उकार मात्रा दूसरीऔर श्रेष्ठ अकारउभय भाव है स्वप्नवततैजस दूसर पादजो है इसको जानताप्राप्त ज्ञान उत्कर्षउस कुल में नहिं जन्म कोउजेहि न हिरण्यमय ज्ञान.हिरण्यमय शब्द सूत्रात्मा, जीवात्मा के लिए है.मकार तीसरी मात्रामाप जान विलीनसुसुप्ति स्थान सम देह हैप्रज्ञा तीसर पादजान माप सर्वस्व कोसब लय होत स्वभाव.मात्रा रहित ॐकार हैब्रह्म का चौथा पादव्यवहार परे प्रपंच परेकल्याणम् है आत्मआत्म बोध कर आत्म सेआत्म प्रवेशित नित्य.
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